नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट संकट के बीच गैस उत्पादन बढ़ाने के निर्देश, सरकार ने लागू की इमरजेंसी पावर #979 *HJ*

सारांश :

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कतर से गैस सप्लाई बाधित होने की आशंका के बीच भारत सरकार ने इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल किया है। तेल रिफाइनरियों को आदेश दिया गया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल केवल रसोई गैस (LPG) बनाने के लिए करें। इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध के हालात में देश के भीतर सिलेंडरों की किल्लत को रोकना है। भारत की सप्लाई चैन पर अब गंभीर खतरा है, जिस कारण सरकार ऐसे कदम उठा रही है।


गैस किल्लत रोकने के लिए कड़े कदम

पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते युद्ध के खतरों को देखते हुए केंद्र सरकार ने देश की तेल रिफाइनरी कंपनियों को एलपीजी का उत्पादन तेज करने के निर्देश दिए हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 (Essential Commodities Act) के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि रिफाइनरियां अब प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसों का इस्तेमाल प्राथमिकता के आधार पर केवल रसोई गैस बनाने के लिए ही करेंगी। आदेश के अनुसार, इन गैसों की सप्लाई अनिवार्य रूप से सरकारी तेल कंपनियों—इंडियन ऑयल (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) को करनी होगी, ताकि आम उपभोक्ताओं तक गैस की पहुंच बनी रहे।

सप्लाई चैन पर मंडराता खतरा

मौजूदा संकट की दो मुख्य वजहें बताई जा रही हैं। पहला, 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) जलमार्ग का असुरक्षित होना, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 54% एलएनजी और 50% कच्चा तेल इसी रास्ते से मंगाता है। युद्ध की स्थिति में टैंकरों का यहां से गुजरना जोखिम भरा हो गया है। दूसरी बड़ी वजह कतर में गैस उत्पादन का रुकना है। कथित तौर पर 1 मार्च 2026 को कतर के औद्योगिक इलाकों में हुए हमलों के बाद वहां के एलएनजी प्लांट से उत्पादन ठप हो गया है। भारत अपनी जरूरत की 40% एलएनजी के लिए कतर पर ही निर्भर है।

उद्योगों और कीमतों पर संभावित असर

सप्लाई में कमी आने की चेतावनी देते हुए सीएनजी कंपनियों के संगठन (ACE) ने चिंता जताई है कि अगर कतर से सस्ती गैस नहीं मिली, तो उन्हें 'स्पॉट मार्केट' से महंगी गैस खरीदनी पड़ सकती है। फिलहाल स्पॉट मार्केट में गैस की कीमतें अनुबंध वाली गैस से दोगुनी यानी करीब 25 डॉलर प्रति यूनिट तक पहुंच गई हैं। यदि कीमतें बढ़ती हैं, तो सीएनजी के दाम भी बढ़ सकते हैं, जिससे लोग इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर स्थायी रूप से रुख कर सकते हैं। इसके अलावा, प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों के मार्जिन पर भी असर पड़ने का दावा किया जा रहा है, क्योंकि प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल पेट्रोकेमिकल बनाने के बजाय अब कम कीमत वाली एलपीजी बनाने में किया जाएगा।

राहत की बात और वर्तमान स्थिति

चुनौतीपूर्ण स्थितियों के बावजूद, आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि घबराने की आवश्यकता नहीं है। भारत अब अपनी जरूरत का 20% कच्चा तेल रूस से मंगा रहा है, जिससे होर्मुज रूट पर निर्भरता कुछ कम हुई है। फरवरी में रूस से करीब 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन तेल का आयात किया गया। वर्तमान में देश के पास पेट्रोलियम और एलपीजी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध होने का दावा किया गया है। साथ ही, कुछ रिफाइनरियों के बंद होने की खबरों को महज अफवाह बताया गया है।

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