नई दिल्ली: महिला आरक्षण से जुड़ा ऐतिहासिक बिल लोकसभा में गिरा, 54 वोटों की कमी से मोदी सरकार को मिली पहली संसदीय हार *CDFG* #997

संक्षिप्त विवरण

नई दिल्ली में 17 अप्रैल 2026 को महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पारित नहीं हो सका। 543 से बढ़ाकर 850 सीटें करने के प्रावधान वाले इस बिल को दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़े। 12 साल के शासन में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार सदन में कोई बिल पास कराने में नाकाम रही है। विपक्ष ने इसे संविधान की जीत बताया है।


लोकसभा में बहुमत का गणित: क्यों गिरा महिला आरक्षण बिल?

संसद में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वें) संशोधन बिल पर 21 घंटे की लंबी चर्चा के बाद वोटिंग हुई। लोकसभा की वर्तमान क्षमता 540 है (तीन सीटें खाली), जिसमें से कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया। नियमों के अनुसार, इस संविधान संशोधन बिल को पारित करने के लिए सदन के दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की आवश्यकता थी। हालांकि, सरकार के पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़े, जबकि विपक्ष ने इसके विरोध में 230 वोट डाले। नतीजतन, यह महत्वपूर्ण बिल 54 वोटों के अंतर से गिर गया।

लिंक होने के तर्क पर दो अन्य बिलों को पेश करने से इनकार

सरकार ने इस मुख्य बिल के साथ जुड़े दो अन्य विधेयकों—परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026—पर वोटिंग कराने से इनकार कर दिया। सरकार का तर्क था कि ये बिल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग से वोटिंग की आवश्यकता नहीं है। गृहमंत्री अमित शाह ने मतदान से पहले एक घंटे के संबोधन में विपक्षी दलों को चेतावनी दी थी कि यदि यह बिल पास नहीं होता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी विपक्ष की होगी और देश की महिलाएं इसका हिसाब मांगेंगी।

विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया: "संविधान पर हमले को विफल किया"

बिल के गिरते ही विपक्षी खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने संविधान पर हुए हमले को हरा दिया है। उनके अनुसार, यह बिल महिला आरक्षण के बजाय भारत की राजनीतिक संरचना को बदलने का एक तरीका मात्र था। प्रियंका गांधी ने इसे लोकतंत्र और देश की एकता की बड़ी जीत करार दिया। वहीं, शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना गलत है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे 'दिल्ली के अहंकार' की हार बताया।

मोदी सरकार की अंतिम कोशिशें और भावनात्मक अपील

सरकार को पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि उसके पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है। यही कारण था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत स्तर पर तीन बड़ी अपीलें की थीं। उन्होंने सांसदों से अपनी 'अंतर्रात्मा की आवाज' सुनने और विपक्ष से क्रेडिट का 'ब्लैंक चेक' लेने तक की बात कही थी। गृहमंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कांग्रेस, TMC, DMK और समाजवादी पार्टी की आलोचना की और कहा कि बिल गिराकर जश्न मनाना निंदनीय और कल्पना से परे है।

संसद के भीतर और बाहर का माहौल

वोटिंग के दौरान सदन में भारी गहमागहमी रही। जहां विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार के प्रस्ताव को खारिज किया, वहीं भाजपा की महिला सांसदों ने संसद परिसर के बाहर प्रदर्शन किया। अमित शाह ने कड़े शब्दों में कहा कि शोर-शराबा करके सदन में तो बचा जा सकता है, लेकिन जब नेता जनता के बीच जाएंगे, तो मातृशक्ति इस बाधा का हिसाब मांगेगी। यह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल की पहली ऐसी घटना है जब वह सदन की दहलीज पर किसी बिल को कानून में बदलने में विफल रही है।

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