दृष्टिकोण : भाजपा में बगावत का सम्मान - राठौड़, नरोत्तम मिश्रा और अयोध्या के लल्लू सिंह हुए खत्म, फिर बृजभूषण और पवन सिंह का जलवा कैसे? #893 *HA*
संक्षेप:
नमस्कार, डीबीयूपी इंडिया की विशेष सिरीज़ दृष्टिकोण में इस बुधवार बात यूपी चुनाव से पहले भाजपा और उसके बागियों के सम्मान की। राजस्थान के राजेंद्र राठौड़ और म.प्र के नरोत्तम मिश्रा भाजपा के ब्रांड थे। वीवीआईपी सीट अयोध्या के लल्लू सिंह भी गृह मंत्री के करीबी थे। लेकिन राजनीति का लंबा अनुभव, जीतने की पूरी उम्मीद, और फिर करारी हार, यह इन तीनों नेताओं में समान बात रही। हार के बाद समर्थकों को उम्मीद थी उपचुनाव में पद मिलेगा, राज्यसभा भेजा जाएगा या पार्टी में ही बड़ा पद मिल जाएगा, लेकिन पद तो दूर आज इन नेताओं को पार्टी एहमियत भी सिर्फ़ उम्र के सम्मान में दे रही है। पवन सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ा 6 सीटों पर नुकसान किया और बनाए गए एमएलसी, बृजभूषण शरण सिंह ने खुला चैलेंज दिया, बयान दिए, और बेटा बना सांसद। संदेश साफ़ है, पार्टी से बगावत करने की हिम्मत है तो सम्मान है, यदि पार्टी ही पहचान है तो कोई भी हार राजनीति से विदाई तय कर सकती है।
राठौड़ और मिश्रा: 35 साल की लंबी वफादारी के बाद भी पार्टी ने किया दरकिनार
राजस्थान के दिग्गज नेता राजेंद्र राठौड़ और मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, दोनों ही भाजपा के ऐसे कद्दावर चेहरे रहे हैं, जिनका अपने प्रदेशों की राजनीति में एक समय भारी जलजला हुआ करता था। लगभग 35 सालों से राजनीति में सक्रिय राठौड़ 2023 से पहले नेता प्रतिपक्ष और भावी मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार थे। वहीं, नरोत्तम मिश्रा भी मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे खड़े थे।
लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद इन दोनों नेताओं का राजनीतिक पतन शुरू हो गया। इनके समर्थकों ने लगातार दावा किया कि इतने अनुभवी नेताओं के बिना विधानसभा नहीं चल सकती और जल्द ही किसी की सीट खाली कराकर इन्हें मंत्री बनाया जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इन्हें टिकट नहीं मिला। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष पद और राज्यसभा की दौड़ में भी इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। जानकारों के अनुसार, जब प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा के बाद नरोत्तम मिश्रा मीटिंग से बाहर आ रहे थे, तो उनके चेहरे पर निराशा और आंखों में नमी साफ झलक रही थी।
अयोध्या के लल्लू सिंह: अमित शाह के करीबी होने के बावजूद 'राम भरोसे' वापसी
इस राजनीतिक समीकरण में अयोध्या से पूर्व सांसद लल्लू सिंह का मामला बेहद दिलचस्प है। कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेहद खास माने जाने वाले लल्लू सिंह को 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या जैसी वीवीआईपी और प्रतिष्ठा वाली सीट पर समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।
इस ऐतिहासिक हार के बाद लल्लू सिंह के समर्थकों को बड़ी उम्मीद थी कि पार्टी अयोध्या के सम्मान और उनकी वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें किसी अन्य बड़े पद या संगठन में जगह देकर जरूर नवाजेगी। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। पार्टी ने उन्हें पूरी तरह से किनारे कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लल्लू सिंह के पास एक मजबूत जनाधार जरूर है, लेकिन उनके अंदर बागी होने का तेवर बिल्कुल शून्य है। भाजपा आलाकमान यह भलीभांति जानता है कि लल्लू सिंह पार्टी के खिलाफ जाकर कोई कदम नहीं उठा सकते। भाजपा छोड़ने के बाद उनका व्यक्तिगत राजनीतिक अस्तित्व न के बराबर है। यही कारण है कि उनकी सम्मानजनक वापसी अब केवल 'राम भरोसे' ही रह गई है।बृजभूषण शरण सिंह: खुली चुनौती और मजबूत जनाधार के आगे नतमस्तक हुई पार्टी
वफादारों की इस अनदेखी के बीच कैसरगंज के बाहुबली नेता बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक ग्राफ एक अलग ही कहानी बयां करता है। बृजभूषण अक्सर सार्वजनिक मंचों से पार्टी लाइन से हटकर सीधे तौर पर बयानबाजी करते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने कथित तौर पर भरे मंच से कह दिया था कि "अगर पार्टी को क्षत्रियों का काम नहीं है, तो वह साफ बता दे।"
पार्टी को इस तरह की खुली चुनौती और सीधे तौर पर आंख दिखाने के बावजूद, भाजपा ने उनके परिवार को दरकिनार करने के बजाय उन्हें और लाभ दिया (जैसे उनके बेटे को टिकट देना)। इसका सबसे बड़ा कारण बृजभूषण का अपना बेहद मजबूत व्यक्तिगत जनाधार और जरूरत पड़ने पर खुली बगावत करने की उनकी हिम्मत है। पार्टी यह जानती है कि उनसे सीधा टकराव भारी पड़ सकता है और वह पार्टी को नुकसान पहुंचाने का माद्दा रखते हैं।
पवन सिंह का उदाहरण: पार्टी को हराने वाले बागी को मिला एमएलसी का इनाम
राठौड़ और लल्लू सिंह जैसे नेताओं के ठीक विपरीत स्थिति पवन सिंह की देखने को मिली। 2024 के चुनाव में टिकट कटने के बाद पवन सिंह ने बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। राजनीतिक दावों के अनुसार, पवन सिंह की इस बगावत के कारण शाहाबाद क्षेत्र में भाजपा को 6 सीटों का भारी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन इसके बावजूद, पार्टी को चुनौती देने वाले पवन सिंह को बाद में एमएलसी बना दिया गया। इससे यह सीधा संदेश जाता है कि पार्टी उन नेताओं को अधिक तरजीह देती है जो अपना दम-खम दिखाते हैं और पार्टी को जिताने के साथ-साथ हराने की ताकत भी रखते हैं।
क्या राजनीति में 'जनाधार' और 'बगावत' ही है सफलता की कुंजी?
इस पूरे घटनाक्रम से आज के युवा नेताओं के लिए एक बड़ा राजनीतिक सबक सामने आता है। राजनीति में 'गुलामों' या केवल पार्टी की कृपा पर आश्रित रहने वालों से ज्यादा उन नेताओं का सम्मान होता है जो स्वाभिमानी हैं और जिनका अपना स्वतंत्र जनाधार है।
जानकारों का यह भी स्पष्ट रूप से मानना है कि राजेंद्र राठौड़, नरोत्तम मिश्रा और लल्लू सिंह जैसे खांटी नेताओं को भविष्य में अगर कोई पद मिलता भी है, तो वह केवल चुनावों के ठीक आसपास ही होगा। इसका मुख्य उद्देश्य चुनावों में इनकी मेहनत और अनुभव का फायदा उठाना होगा। चुनाव बीत जाने और सरकार बनने के बाद, इन्हें फिर से किसी बड़े पद से वंचित रखा जाएगा। राजनीति में वफादारी के साथ-साथ खुद का जनाधार और बगावत का साहस होना ही असली ताकत है।
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