दावा : उत्तर प्रदेश में दिसंबर में हो सकते हैं विधानसभा चुनाव, जनगणना और परीक्षाएं बनीं बड़ी वजह *DALW* #999

उत्तर प्रदेश में फरवरी 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव कथित तौर पर अपने तय समय से 3 महीने पहले, यानी दिसंबर 2026 के अंत या जनवरी 2027 के शुरुआती हफ्तों में कराए जा सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फरवरी में राष्ट्रीय जनगणना का दूसरा चरण और बोर्ड परीक्षाओं के एक साथ टकराव के कारण यह संभावना जताई जा रही है। चुनावी आहट के बीच भाजपा, सपा, बसपा जैसी सभी प्रमुख पार्टियां सभी जिलों में पूरी तरह से इलेक्शन मोड में आ गई हैं। डीबीयूपी इंडिया के विश्वसनीय विभागीय सूत्रों ने दावा किया है कि जुलाई में पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर सरकार विधानसभा चुनाव की तैयारी करेगी।


विधानसभा चुनाव समय से पहले होने के संकेत और प्रशासनिक कारण

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक यह चर्चा तेज है कि विधानसभा चुनाव अपने तय समय से पहले हो सकते हैं। सूत्रों का दावा है कि इसका सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय जनगणना है। उत्तर प्रदेश में चुनाव वैसे तो फरवरी में प्रस्तावित हैं, लेकिन इसी महीने में देश की जनगणना का दूसरा चरण भी शुरू होने जा रहा है।
इसके अतिरिक्त, फरवरी और मार्च के महीनों में ही यूपी बोर्ड, सीबीएसई (CBSE) और आईसीएसई (ICSE) की बोर्ड परीक्षाएं भी आयोजित होती हैं। इन परीक्षाओं को संपन्न कराने और कॉपियां जांचने में लाखों शिक्षक व कर्मचारी व्यस्त रहते हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी चुनाव संपन्न होने के बाद ही बोर्ड परीक्षाएं आयोजित करवाई जा सकी थीं।

'एक ही स्टाफ और दो बड़ी ड्यूटियां' बना सबसे बड़ा संकट

प्रशासनिक मशीनरी के सामने सबसे बड़ा संकट मैनपावर का है। देश में जनगणना का पहला चरण चल रहा है, जो 30 सितंबर तक पूरा होना है। इसके बाद दूसरा चरण 9 से 28 फरवरी 2027 के बीच निर्धारित है, जिसमें जनता की सामाजिक-आर्थिक और जातीय जानकारी जुटाई जानी है।
उत्तर प्रदेश में इस जनगणना कार्य के लिए लगभग 5.25 लाख शिक्षकों और 600 से ज्यादा एसडीएम व डीएम की ड्यूटी लगी हुई है। दूसरी तरफ, राज्य में मतदान केंद्रों (बूथों) की संख्या बढ़कर अब 1.77 लाख हो चुकी है, जिसके लिए चुनाव ड्यूटी में कम से कम 7 लाख से अधिक कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। निर्वाचन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जो स्टाफ जनगणना के कार्य में लगा है, आमतौर पर वही स्टाफ चुनाव भी संपन्न कराता है। यदि ये दोनों प्रक्रियाएं एक साथ शुरू हुईं, तो सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायतों तक की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था ठप हो सकती है। इसी वजह से चुनाव को दिसंबर के अंत या जनवरी की शुरुआत में कराने की संभावना बलवती हो रही है।

क्या समय से पहले चुनाव के लिए तैयार है निर्वाचन आयोग?

समय से पहले चुनाव कराए जाने की संभावनाओं पर चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि इसके लिए सबसे पहले वोटर लिस्ट का एसआईआर (SIR) कार्यक्रम जारी होना जरूरी है। सामान्य प्रक्रियाओं के तहत अंतिम मतदाता सूची जनवरी के मध्य में प्रकाशित की जाती है। हालांकि, अधिकारियों के अनुसार यदि आयोग समय से पहले चुनाव कराने का अंतिम निर्णय लेता है, तो इस बार अंतिम वोटर लिस्ट का प्रकाशन नवंबर महीने तक ही पूरा कर लिया जाएगा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी दफ्तर के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि यदि जनवरी से पहले मतदान होता है, तो एसआईआर 2025-26 की मतदाता सूची को ही मुख्य आधार बनाया जा सकता है। अगर चुनाव पहले भी होते हैं, तो आयोग के पास तैयारियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय मौजूद है।

आर्थिक मंदी और महंगाई से माहौल बदलने का डर

समय से पहले चुनाव की अटकलों के पीछे एक और बड़ा कारण आर्थिक मंदी और महंगाई को माना जा रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के प्रमुख नेता राहुल गांधी भी आने वाले दिनों में देश के सामने संभावित आर्थिक संकट और बढ़ती महंगाई को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर चुके हैं। माना जा रहा है कि वित्तीय वर्ष की आखिरी तिमाही (जनवरी से मार्च) के दौरान जमीनी स्तर पर मंदी और महंगाई का असर जनता पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे सकता है। ऐसे में वोटरों के भीतर सत्ताधारी दल के प्रति नाराजगी पनपने का खतरा बढ़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ऐसा कोई भी बड़ा जोखिम उठाना नहीं चाहेगी और माहौल बिगड़ने से पहले ही चुनाव कराना पसंद कर सकती है। सपा और बसपा के नेताओं का भी यही आरोप है कि भाजपा आर्थिक मंदी के इस असर को समय से पहले ही भांप चुकी है और इसीलिए चुनाव जल्द से जल्द कराने की फिराक में है।

राजनीतिक दलों की तैयारियां: भाजपा ने प्रभारी मंत्रियों को मैदान में उतारा

चुनावी आहट के स्पष्ट संकेत मिलते ही उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख राजनीतिक दल पूरी तरह से 'इलेक्शन मोड' में आ चुके हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सांगठनिक स्तर पर अपनी तैयारियां बेहद तेज कर दी हैं। भाजपा के संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने 98 संगठनात्मक जिलों के अध्यक्षों की मौजूदगी में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यूपी विधानसभा चुनाव में 'पश्चिम बंगाल चुनाव मॉडल' को अपनाया जाएगा, जिसके तहत 1.76 लाख बूथ पालकों की नियुक्ति का काम तेजी से पूरा करने को कहा गया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी जिलों के दौरे शुरू कर दिए हैं और राज्यभर में करोड़ों रुपये की विकास परियोजनाओं के शिलान्यास किए जा रहे हैं। 'बूथ जीता, चुनाव जीता' के मूल मंत्र पर काम करते हुए पार्टी अपनी 11 सदस्यीय बूथ कमेटियों का भौतिक सत्यापन (फिजिकल वेरिफिकेशन) कर रही है। साथ ही, सभी जिलों के प्रभारी मंत्रियों को तत्काल अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर कोर कमेटी के साथ बैठकें करने और स्थानीय स्तर की समस्याओं को तुरंत सुलझाने के कड़े निर्देश दिए गए हैं।

समाजवादी पार्टी ने तय किए 200 उम्मीदवार, 'PDA' को मजबूत करने की कवायद

दूसरी तरफ, विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) भी किसी मामले में पीछे नहीं रहना चाहती। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने समय से पहले चुनाव की संभावनाओं को देखते हुए लगभग 200 उम्मीदवारों के नाम अंदरूनी तौर पर तय कर लिए हैं, जिनमें से अधिकांश पार्टी के मौजूदा विधायक ही हैं। हाल ही में 8 जून को नई दिल्ली में आयोजित 'INDIA ब्लॉक' की बैठक में अखिलेश यादव शामिल हुए थे, जहां 25 राजनीतिक दलों के साथ चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई। इस बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने निर्वाचन की निष्पक्षता और एसआईआर (SIR) को लेकर देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को पत्र लिखने की बात भी कही है।
इसके अलावा, 5 जून को नई दिल्ली में ही राहुल गांधी के साथ उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलित और अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं की एक बेहद अहम बैठक संपन्न हुई थी, जिसे विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी के 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और अधिक मजबूती देने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। अखिलेश यादव ने अपने पार्टी पदाधिकारियों को स्पष्ट तौर पर निर्देशित किया है कि चुनाव चाहे अपने तय समय यानी फरवरी 2027 में हों या फिर इसी साल नवंबर-दिसंबर में, बूथ स्तर की कमेटियों को हर परिस्थिति के लिए चौबीसों घंटे तैयार रहना होगा।

बसपा और सुभासपा ने भी घोषित किए प्रभारी

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) भी अपनी गोटियां सेट करने में जुट गई हैं। ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा ने राज्य की 44 विधानसभा सीटों पर अपने प्रभारियों की तैनाती कर दी है और माना जा रहा है कि यही प्रभारी आने वाले समय में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार होंगे। वहीं, बसपा प्रमुख मायावती ने भी अंदरखाने लगभग 50 सीटों पर अपने प्रभारियों के नाम फाइनल कर लिए हैं, जिनमें से 5 नामों की औपचारिक घोषणा सार्वजनिक रूप से की जा चुकी है। मायावती लगातार जिला प्रभारियों के साथ बैठकें कर उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर चुनावी माहौल तैयार करने के निर्देश दे रही हैं। गौरतलब है कि साल 2022 के चुनावों में बसपा ने 15 जनवरी को अपनी पहली सूची जारी की थी, जबकि सपा ने आचार संहिता लगने के बाद 13 जनवरी और भाजपा ने 15 जनवरी 2022 को अपने उम्मीदवारों की पहली सूची सार्वजनिक की थी, लेकिन इस बार सभी दल महीनों पहले से ही कैंडिडेट फाइनल करने में जुटे हैं।

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