यूपी पंचायत चुनाव: फाइनल वोटर लिस्ट जारी, 29 लाख मतदाता बढ़े और 2 करोड़ के नाम कटे *DHKR* #999
संक्षिप्त विवरण
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के लिए बुधवार को अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई है, जिसमें मतदाताओं की संख्या 29 लाख बढ़कर अब 12.58 करोड़ से अधिक हो गई है। इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान जहां 2.32 करोड़ से अधिक नए नाम जोड़े गए, वहीं गड़बड़ियों के चलते 2.03 करोड़ से अधिक नाम काटे भी गए हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने इस बार मतदाताओं को 9 अंकों का एक खास यूनिक पहचान नंबर आवंटित किया है। कई जिलों में मतदाताओं को इसे डाउनलोड करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य निर्वाचन आयोग का बड़ा बदलाव: हर वोटर को मिला खास नंबर
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अंतिम मतदाता सूची बुधवार को आधिकारिक तौर पर जारी कर दी गई है। आयोग ने तमाम दावों, आपत्तियों के निस्तारण और गहन सत्यापन के बाद इस फाइनल लिस्ट को तैयार किया है। इस बार की सूची में एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है, जिसके तहत हर पंचायत मतदाता को 9 अंकों का एक यूनिक पहचान नंबर जारी किया गया है। हालांकि, सूची जारी होने के साथ ही कई जिलों में मतदाताओं को इसे डाउनलोड करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिसे तकनीकी दिक्कतों के चलते होना बताया जा रहा है।
मतदाता सूची का गणित: 29 लाख नए वोटर बढ़े, करोड़ों के नाम कटे
जारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में अब पंचायत चुनाव के लिए कुल 12 करोड़ 58 लाख 51 हजार 570 मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग कर सकेंगे। इस पुनरीक्षण प्रक्रिया से पहले मतदाताओं की संख्या 12 करोड़ 29 लाख 50 हजार 52 थी, जिससे इस बार कुल 29 लाख 1 हजार 518 मतदाताओं की वृद्धि दर्ज की गई है।
इस प्रक्रिया के दौरान सूची में कुल 2 करोड़ 32 लाख 24 हजार 805 नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए। इसके विपरीत, एक से अधिक जगह नाम शामिल होने, पता बदलने, मतदाता की मृत्यु होने और अन्य तकनीकी कारणों के चलते कुल 2 करोड़ 3 लाख 23 हजार 287 मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं। गौरतलब है कि पुनरीक्षण के पहले दौर में 12 करोड़ 69 लाख 69 हजार 610 मतदाता बने थे, लेकिन दावे और आपत्तियों के निस्तारण के दौरान 11 लाख 18 हजार 840 नाम और कम हो गए।
अभी चुनाव तय नहीं: अगले 6 महीने प्रधान ही संभालेंगे प्रशासक की कुर्सी
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बीती 26 मई को समाप्त हो चुका है। समय पर चुनाव न हो पाने की स्थिति को देखते हुए सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया था, जिसके तहत निवर्तमान प्रधानों को ही अगले 6 महीने के लिए प्रशासक के तौर पर जिम्मेदारी सौंप दी गई है। इसके साथ ही सरकार ने पंचायत चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण को लेकर एक पिछड़ा वर्ग आयोग का भी गठन किया है। इस कमिशन को जिलावार आर्थिक और सामाजिक स्तर की समीक्षा करने और अपनी रिपोर्ट 6 महीने के भीतर सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख: जुलाई में मांगी पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट
भले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने आयोग को रिपोर्ट सौंपने के लिए 6 महीने का लंबा वक्त दिया है, लेकिन जल्द पंचायत चुनाव कराने की मांग को लेकर दायर एक याचिका फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है। इस मामले पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए ओबीसी कमिशन को जुलाई में ही अपनी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश जारी किया है।
विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव कराने से कतरा रहे राजनीतिक दल
उत्तर प्रदेश में फरवरी-मार्च के महीनों में विधानसभा चुनाव होने प्रतावित हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के भीतर यह डर देखा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले पंचायत चुनाव कराने से उनके संगठन और चुनावी तैयारियों को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है। इस डर के पीछे का मुख्य कारण यह माना जाता है कि पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं लड़े जाते, जिससे स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और वर्चस्व की जंग काफी बढ़ जाती है। कई मौकों पर एक ही राजनीतिक पार्टी के दो मजबूत कार्यकर्ता एक-दूसरे के आमने-सामने चुनावी मैदान में उतर जाते हैं, जिससे मुख्य चुनाव के समय पार्टी कैडर बिखरने की संभावना बनी रहती है। बता दें कि प्रदेश में ग्राम पंचायत के साथ-साथ क्षेत्र पंचायत (बीडीसी) और जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव भी एक साथ ही कराए जाने हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें