उत्तर प्रदेश : 800 साल पुरानी मजार पर चला बुलडोजर, रातों-रात जगह बनीं जंगल, लग गए पौधे #988 *GG*
संक्षिप्त खबर:
उत्तर प्रदेश में इटावा के फिशर वन क्षेत्र में वन विभाग ने बुधवार रात बुलडोजर कार्रवाई करते हुए कथित 800 साल पुरानी 'बीहड़ वाले सैयद बाबा' की मजार को ढहा दिया गया, गुरुवार सुबह तक वहां पौधे लगाकर उसे पूरी तरह जंगल का रूप दे दिया गया। वन विभाग के अनुसार, 3000 स्क्वायर फीट में फैला यह निर्माण सरकारी वन भूमि पर अवैध रूप से किया गया था जिसका कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं मिला। यहां हर साल फरवरी में उर्स लगता था जिसमें 5 से 7 हजार लोग आते थे। उत्तर प्रदेश में पिछले एक महीने में अवैध मस्जिदों और मजारों पर यह तीसरा बड़ा बुलडोजर एक्शन है।
रातों-रात मजार से जंगल में तब्दील हुई जगह
इटावा शहर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर बीहड़ के फिशर वन क्षेत्र में स्थित 'बीहड़ वाले सैयद बाबा' की मजार बुधवार शाम तक जहाँ खड़ी थी, गुरुवार सुबह वहां केवल कमर तक ऊंचे पौधे नजर आए। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बुधवार शाम 6 बजे वन विभाग की टीम 3 बुलडोजर लेकर मौके पर पहुंची थी। रास्ते पर 20 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात कर आवाजाही रोक दी गई। रात 1 बजे तक लगातार 7 घंटे चले इस ऑपरेशन में मजार को पूरी तरह से जमींदोज कर दिया गया और जमीन को समतल कर वहां पौधे लगा दिए गए, जिससे यह जगह 12 घंटे के भीतर ही वापस जंगल जैसी दिखने लगी।
सीएम पोर्टल पर शिकायत और कानूनी कार्रवाई का पूरा घटनाक्रम
इस कार्रवाई की शुरुआत 3 जनवरी, 2026 को हुई जब हिंदू संगठनों ने IGRS पोर्टल के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय में मजार के अवैध होने की शिकायत की। 5 जनवरी को डीएम कार्यालय के आदेश पर वन रेंज अधिकारी अशोक कुमार शर्मा ने जांच की। जांच में पाया गया कि मजार फिशर वन के कंपार्टमेंट नंबर-3 में है और 1916, 1936 तथा 1946 के राजपत्रों के अनुसार यह जमीन वन विभाग की है। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत गैर-वन कार्यों पर रोक के चलते 23 जनवरी को यहां धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगा दी गई और वन विभाग की कोर्ट में याचिका दायर की गई।
मजार पक्ष को 5 फरवरी से लेकर 28 मार्च 2026 तक दस्तावेज पेश करने के कई मौके दिए गए, लेकिन वे कोई वैध प्रमाण नहीं दे सके। इसके बाद कोर्ट ने ध्वस्तीकरण का आदेश दिया। मजार के केयरटेकर फजले इलाही ने कानपुर स्थित वन संरक्षक के पास अपील की, लेकिन वह भी खारिज हो गई। इससे पहले फरवरी में ही मजार तक जाने वाले रास्ते को बुलडोजर से खोद दिया गया था ताकि आवाजाही रोकी जा सके।
800 साल पुरानी होने का दावा, गोरी के सेनापति से जुड़ी अफवाहें खारिज
मजार की देखरेख करने वाले इटावा के आकालगंज निवासी फजले इलाही और उनके सहयोगी मौलाना नदीम का दावा है कि यह मजार 800 साल पुरानी है। हालांकि, मौलाना नदीम ने उन दावों को सिरे से गलत बताया जिनमें इसे मोहम्मद गौरी के सेनापति शमसुद्दीन की मजार कहा जा रहा था। उन्होंने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि 1194 के युद्ध में शमसुद्दीन मारा जरूर गया था, लेकिन उसकी मजार फिशर वन में कैसे बनी, इसका कोई प्रमाण नहीं है।
दूसरी ओर, वन विभाग का कहना है कि मजार के निर्माण का कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। समय के साथ वन भूमि पर निर्माण बढ़ता गया और एक स्थायी ढांचा खड़ा कर लिया गया। यहां हर साल फरवरी में उर्स लगता था जिसमें 5 से 7 हजार लोग आते थे, लेकिन इस बार उर्स का आयोजन नहीं हो सका।
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